रेल की यात्रा
18 अगस्त 2023
मुझे किसी सामाजिक कार्य के लिए जयपुर से बाड़मेर के लिए निकलना था। हालांकि जयपुर से बाड़मेर जाने के लिए यातायात के दोनों साधन उपलब्ध थे लेकिन मैने भारतीय रेल में जाने का मानस बनाया। भारतीय रेल आज भी अपने तय समय से लगभग तीन घंटे विलंब से चल रही थीं। मुझे और स्टेशन पर बैठे अन्य सहयात्रियों को इसको लेकर रेल मंत्रालय से कोई भी शिकायत नहीं थी फ़िर भी स्टेशन पर बैठी एक सरकारी महीला रेल्वे कर्मचारी बार–बार अपनी सधी हुई आवाज में यात्रीगण कृपया ध्यान दें..........आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है...बोलकर यात्रियों से क्षमा मांग रही थीं। मुझे उनसे शिकायत इसलिए नहीं थी की भारत में ये सब सामान्य हैं, क्योंकि भारत में नेता और रेल कभी समय पर नहीं आते।भारत में यदि रेल अपने तय समय पर आ जाएं तो बड़े अचंभे का विषय होता हैं।
रेल अपने निर्धारित समय से तीन घंटे विलंब से जब जयपुर जंक्शन पर पहुंची तो सभी यात्री एक–दूसरे को बधाईयां देने लगे। मेरे पास सामान्य श्रेणी का टिकट था तो जैसा की हमेशा ही होता हैं की रेल में सामान्य श्रेणी के दो डिब्बे फिक्स होता हैं। एक डिब्बा इंजन के तुरंत बाद में और दूसरा सबसे अंत में होता हैं। मैं रेल के रुकते ही तुरंत इंजन के पिछे वाले डिब्बे में चढ़ गया। डिब्बा एकदम खचा–खच भरा हुआ था। ये रेल गुहावाटी से आई थीं तो इसके सामान्य श्रेणी के डिब्बे में सभी मजदूर वर्ग के लोग थे जो बीड़ी–सिगरेट का धुआं छोड़ रहे थे। मैं कुछ देर के लिए तो खड़ा रहा फिर सोचा इस तरह खड़े होकर सिंध से सटे ज़िले बाडमेर में पहुंचना मुश्किल हैं। मैं तुरंत स्लीपर कोच में आ गया। चुकीं जब रेल भी अपने तय समय पर नहीं चलती हैं तो यात्री भी नियमों की धज्जियां उड़ा सकते हैं, हालांकि मैंने पहली बार रेल्वे नियम का उल्लंघन किया था। रात भर बेफिक्र होकर सोता रहा,सुबह जब जोधपुर आया तो नीचे उतरा मुंह धोया और फिर सोचा कि अब टीटीई आ सकते हैं,इसलिए मुझे वापस सामान्य श्रेणी में चले जाना चाहीए। लेकिन मैं फिर से वापस स्लीपर कोच में आकर बैठ गया। मेरे मन से एक अंतरात्मा की आवाज आ रही थीं की अब आगे के सफ़र में टीटीई ज़रूर आएंगे। जोधपुर से रेल रवाना हो चुकी थी,लूणी के पास आते ही एक सफ़ेद पोशाक पहने सज्जन ने मुझे आवाज दी और टिकट मांगा। मैंने ऊपर देखा तो पाया कि वो सज्जन कोई ओर नहीं अंतरात्मा की आवाज वाले टीटीई ही हैं। मैंने बेझिझक टीटीई को नमस्ते किया और अपने जूते पहनते हुए उनको बैठने का इशारा किया। टीटीई मेरे कहने पर बैठ गए तब तक मैंने जूते बांध लिए थे। मैंने अपने सामान्य श्रेणी का टिकट टीटीई के हाथ में थमा दिया तो उन्होंने देखते हुए बोला की ये तो सामान्य श्रेणी का टिकट हैं और आप स्लीपर में कैसे ? मैंने एक ही श्वास में बोला की "सर मैं जयपुर से सामान्य डिब्बे में था पूरे डिब्बे में खचाखच भीड़ थी और डिब्बा छोटा होने के कारण जयपुर से जोधपुर तक खड़ा–खड़ा आया हूं। जोधपुर आने के बाद स्लीपर कोच में आकर बैठा हूं। आप चाहो तो मुझे जोधपुर से बाडमेर की स्लीपर कोच की टिकट दे सकते हो।" टीटीई सर मेरे सामने देखते हुए बोले की आपको पता हैं,झूट बोलना महापाप हैं।
जब मैंने जेब से टिकट निकाला था तो साथ में मैंने जान–बूझकर 150 रुपिया जेब से निकाले और वापस जेब में डाल दिए ताकि टीटीई सर देख सके की विधार्थी हैं,और इसके पास इतने ही हैं। टीटीई सर मेरे सम्मानजनक जवाब से संतुष्ट थे। इसलिए शायद वो मेरे से कुछ नहीं लेना चाहते थे तो वो मेरा टिकट लेकर चले गए थोड़ी देर बाद वापस आए तो मैंने उन्हें पुन: खड़े होकर अभिवादन करते हुए बैठने का बोला तो वो तुरंत बैठ गए और मुझे मेरी टिकट वापस लौटाते हुए बोले की बेटा आप बैठो मैं वापस आ रहा हूं, फिर आपका कुछ करते हैं। ऐसे कहते हुए मेरे आप–पास चार से पांच जनों के जुर्माना टिकट वसूला और लगभग बाडमेर तक पांच बार मेरे पास से गुजरे लेकिन कुछ भी नहीं कहा और अपने साथी टीटीई को भी मेरा टिकट जांच करने से मना कर दिया।
बस इस तरह........
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